[रविवार, 18 जुलाई, 2010 | स्रोत : RAJASTHAN PATRIKA]
तिब्बत प्रचीन पर्वातीय देश है लेकिन लोग तिब्बत के बारे में कम और दलाई लामा
तेनजिन गयात्सो के बारे में ज्यादा जानते है। विशव शांति के लिए नोबल पुरस्कार
से सम्मानित तेनजिल ग्यात्सो बौद्ध धर्म के अनुयायी तिब्बतियों के सर्वाच्च धर्म गुरु
है और दलाई लामा उनका पद है। 1959 में कम्युनिस्ट चीन ने जब तिब्बत पर
आधिपत्य जमाया, उस समय दलाई लामा दलाई लामा तिब्बत के सर्वाच्च शासक भी
थे। उन्हें निष्कासित कर दिया गया और वे पिछले 51 सालों से भारत में निर्वासित
जीवन जी रही । उन्होंने अपनी आत्मकथा मेरा देश निकाला में इतिहास के उसी
विस्मृत पृष्ट को उकेरा है जिसके बारे में युवा पीढी बहुत कम जानती है। अंग्रेजी में
लिखी इस आत्मकथा का महेन्द्र कुलश्रेष्ट ने हिंदी मे अनुवाद किया है। दलाई लामा ने
बहुत ही रोचक तरीके से अपने जन्म ,बचपन , धर्मगुरु ,राष्ट्राध्यक्ष बनने और चीन
के तिब्बत पर कब्जा जमाने के बाद लोगों के विद्रोह और चीन के कम्युनिस्ट शासकों
के दमन और अत्याचारों का जीवंत वर्णन किया है। दलाई लामा के अनुसार हजारों
सालों के इतिहास में तिब्बत कभी भी चीन का हिस्सा नहीं रहा। वहां की भाषा ,
संस्कृति और रीति -रिवाज चीन से सर्वथा भिन्न रहे है। इतिहास में एक काल खण्ड
तो ऐसा आया जब तिब्बत के योद्धाओं ने सम्राट को हरा कर चीन पर ही कब्जा कर
लिया था। बाद में तिब्बत में जैसे - जैसे बुद्ध का शाति का संदेश फैला तो तिब्बत
की संस्कृति भी बदलती चली गई। चीन के सम्राट तिब्बत को धर्म गुरु का दर्जा देकर
शीश नवाते रहे लेकिन शीश नवाते रहे लेकिन माओ त्से तुंग की लाल क्रंति ने
तिब्बत को नहीं बख्शा । इस पुस्तक में तिब्बत , भारत और चीन का नकशा दिया
हुआ है जिसे देखकर लगता है कि भारत ने उस समय तिब्बत का साथ दिया होता
और चीन के कब्जा जमाने का विरोध किया होता तो कदाचित आज भारत चीन के
बीच में तिब्बत बफर राष्ट्र के रुप में होता और चीन के कब्जा जमाने का विरोध
किया होता तो कदाचित आज भारत और चीन के बीच में तिब्बत बफर राष्ट्र के रुप
में होता और चीन की कोई भी सीमा भारत की सीमा से नही लगती । आज तो चीन
भारत के अरुणाचल प्रदेश को भी इस आधार पर अपना भू-भाग बताता है कि अतीत
में कभी अरुणाचल प्रदेश तिब्बत के अधीन रहा था । इसलिए वह आज भी हमारा
है। भारत के प्रथम प्रथानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरु ने अगर उस समय लाल चीन
की विस्तारवादी नीतियों को भांप लिया होता तो कदाचित 1962 की पराजय का गरल
देश को नही पीना पडता । दलाई लामा ने इस पुस्तक में नेहरु का इंकार शीर्षक से
पूरा अध्याय लिखा है। एक बात के लिए नेहरु की अवशय सराहना करनी होगी कि
नही उन्ही की सलाह मानकर दलाई लामा ने तिब्बती शरणार्थीयों के बच्चों को आधुनिक शिक्षा से जोडा। वे ही बच्चे अब वयस्क हो गए है औऱ दुनिया के तमाम देशों में तिब्बत की स्वायत्तता का झणडा बुलंद किए है। पुस्तक इतिहास और राजनीति के अध्येताओं सहित जिज्ञासु पाठकों के लिए बहुत उपयोगी है।
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